कोई नाम था

कोई नाम था

हज़ारों नामों में से

मुझे भा गया

बचपन में मैंने

केशों में गूंथा

जब किशोरी हुई

बड़े चाव से

लॉकेट में पिरोया

पहन लिया

और बड़ी होने पर

होश जो आया

मन की हर खूँट

पै लिख लिया

बस वो एक नाम

सोते–जागते

कभी भूलता नहीं

‘गोदना’ गुदा

रोम–रोम पै लिखा

वो एक नाम

बड़ा ही अभिराम

सिर्फ़ ‘नाम’ था

जाने कब, क्यों, कैसे

बन गया था ‘राम’

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