रिश्तों की रफू

रिश्तों की रफू

 

सूरज संग

जलता मेरा दिन

सितारों संग

जागती मेरी रात

हाथ में सुई,

आस का डोरा पिरो

रिश्तों को रफ़ू

करने में जुटी मैं

‘पिराती’ आँखों

लगातार सिलती

हाँपती–सी मैं

सब कुछ भुला के

रफ़ू करती:

इधर से जुड़ा तो

वहाँ उधड़ा

उधर जुड़ गया

तो यहाँ खुला

कैसी कशमकश !

क्या मुसीबत !!

बोसीदा सारे रिश्ते

तार–तार थे

जर्जरित, खोखले

घुन चुके थे

जुड़ते भला कैसे ?

दम नहीं था

टाँके पर टाँकों की

गुठली बनी

बड़ी बदसूरत

मुझे चिढ़ाती–

बेकार मशक्कत !

बेज़ार हुई

आखि़र उठ पड़ी

हाथ मार के

सूरज को बुझाया

उलट डाली

सितारों की बिसात

लपक कर

दरवाज़ा खोल के

बाहर आई

सुई कुएँ में फेंकी

डोरा ‘घूरे’ पे।

फटे–टूटे–उधड़े

रिश्ते उतार

आज़ाद हो गई मैं

जैसी थी, बस

वैसी ही चल पड़ी

एक अकेली।

रिश्ते पहनना ही

छोड़ चुकी थी।

बोझा उठाते कन्धे

हल्के हो गए।

आँखें भर आई थीं

चैन की साँस ली थी।

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