एक कविता

 

मैंने लिखी थी

एक कविता ‘खुशी’

तुम्हें दिखाई

तुमने सरसरी

निगाह डाली

उचाट नज़र से

यूँ–ही सा देखा

तोड़–मसल कर

डस्ट–बिन में

उछाल कर फेंका

‘खुशी’ मरी थी

मैंने फिर लिखी थी

एक कविता

‘उदास’ थी कविता

बड़ी प्यारी–सी

जतन से सँवारा

तुम्हें दिखाया

इस बार तुमने

घोर उपेक्षा

और फ़ालतूपन

की चीज़ जान

चिन्दी–चिन्दी करके

बिखेर फेंकी

मेरा श्रम, लगन

‘खुशी’, ‘उदासी’

दोनों दफ़्न हो गईं

हार न मानी

मैंने फिर लिखी थी

एक कविता

‘खुशी’ या ‘उदासी’ थी

ये पता नहीं

शायद दोनों साथ

हम–जोली थीं

कविता लिखकर

चालाकी करी

चुपके से तहाया

नज़र बचा

दिल की दराज़ में

सरका दिया

तुम्हें पता न चला

वहाँ महफ़ूज़ है।

 

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