दर्द बयां करूं कैसे

कई जख्मों से है भरी पड़ी
मेरी जिंदगी की दास्तान
कहने को साँसे है चल रही पर
जीने से है कहाँ मेरा वास्ता

ना कोई दवा काम आई ना ही दुआ रंग लाई

अब तो वक़्त भी उन पर मरहम लगाते नहीं
तन्हाई में आंसू बहा लेती है आँखे मगर
टूटे थे ख्वाब जब, लम्हा वो भुला पाते नहीं

अपनों की ख़ुशी में लब बस मुस्करा देते हैं
वरना अपनी हंसी भी खुद को रास आते नहीं
करे लाख कोशिश दिल ये फिर भी
अपने मन को बहला हम पाते नहीं

रूठी पड़ी हुई है मुझसे
रंगों की दुनिया मेरी
उस दर्द को बयां करूं कैसे
जिसके घाव नज़र आते नहीं – प्रीती श्रीवास्तव

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