जीवन

कान्टो भरा जीवन है, जीवन मे कान्टे है. दशा देखो उस दीन की, माटी मे अन्न छाटे है.. मार्ग विचलित पथिक है ये सारे, मात्र जीवन कला न पाये है. दशा देखो उस हीन की, पाषाण को समज धान खाये है.. भयाकॄष्ट है नारीयां क्यो सारी? मानवता को पौरुषवाद पढाये है. कर अमानुषिक कृत्यो को ये नर, वासनामय दुर्गुण बढाये है.. गंतव्यविहिन मार्ग हो चुके सारे आज, तथापि मानव उसे विकसित करता है. मात्र अधिकारो पर हाथ बढाये, कर्तव्य तो उसका मरता है..

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