मजदूर का दर्द

मजदूर हूँ मैं
या मजबूर हूँ मैं
समझ में नहीं आता
कौन हूँ मैं !

सूरज की आग में खुद को जलाता
शरीर को अपने हर वक़्त हूँ गलाता
दिल्ली का हो चाहे लालकिला
या हो कुतुबमीनार
राजा साहब की हो हवेली
या हो किसी घर की दीवार
ईंट से ईंट को जोड़कर
यह विस्व बनाया मैंने
चमचमाती सड़कों को
हाथो से सजाया मैंने
चट्टानों को चीरकर
देश की भंडार को हूँ भरता
करिश्मा तो देखो कुदरत का
खाने को हूँ तरसता
कौन करेगा नयोछावर
मुझसे और ज्यादा ,
फिर भी नजरों में लोगों के
तुछ,हीन ,अछूत इंसान हूँ मैं
बात घूमकर वहीं आ गई
कौन हूँ मैं
मजदूर हूँ मैं
या मजबूर हूँ मैं !! – अरुण मिश्र
( published by AMAR UJALA )