कदमो तक धूप

मेरे कदमो तक आती,
ये धूप सुहानी सी,
झंकृत होकर समझाती,
कुछ तान अंजानी सी,
कुछ जीवन की बूंदो को,
दे आती उन निर्मूलो को,
और फूलो मे भरी जाती,
वही मुस्कान पुरानी सी।
मेरे कदमो तक…..

कुछ अलबेले उदास पड़े हैं,
हारे,क्षीण,ध्वस्त,निराश पड़े हैं,
उन चिंगारियों को भी दी
एक उम्मीद नई,जवानी की।
मेरे कदमो……

कुछ अंधकार मे खोए हैं,
कुछ उदासीन सोए हैं,
अंध कालीमा को रंगने आई
किरण-तुलिका,रवानी सी।
मेरे कदमो तक…

क्या सोचूँ,और क्या करूँ,
आडम्बर-नैया पर कहाँ चलूँ,
निस्वार्थ पथ पर बढ चलूँ?
जैसे धूप,नित नई कहानी सी।
मेरे कदमो……

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