मै तो केवल प्राणी हूँ

अंतरिक्ष के विस्तार में मै तो केवल प्राणी हूँ

बहते पानी को देखता तब और अब सूखे में बैठा हूँ

पानी की इन बची बूंदों को समेट समेट कर सोचता हूँ

जगत के प्रायश्चित का जिंदा मै कहानी हूँ

अंतरिक्ष के विस्तार में मै तो केवल प्राणी हूँ

 

कोसों दूर की वह  किरणे रोशन कर कर थक गयी

ना पकड़ा तब ना रख पाया और अब अविष्कार खोजता हूँ

सूर्य नमस्कार करता हूँ पर शक्ति से मै वंचित हूँ

तकनिकी नाकामयाबी का अच्छा मै उदाहरण हूँ

अंतरिक्ष के विस्तार में मै तो केवल प्राणी हूँ

 

तेज हवा में उर्जा थी जो तेज ही बहकर चली गयी

ना सोचा तब ना समझा तब और अब पछताता रहता हूँ

यह वनस्पति यह सूक्ष्म-जीव क्या यह भी उर्जा देती है?

इन सवालों के बवंडर में आज एक वादा करता हूँ

आने वाली पीढ़ियों को एक नयी दिशा दिखाता हूँ

अंतरिक्ष के विस्तार में मै तो केवल प्राणी हूँ

– गौतम दास

 


 


 


 

 

 


 



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