आखिर क्यूँ

 

चुनौती दे कर किस्मत को
मन खुद में ही मगरूर हुआ
दिल और दीमाग की कश्मकश में
सपनो का आइना चूर चूर हुआ

खुद को सँभालने की कोशिश में
अपना अकेलापन ही अपना हुज़ूर हुआ
दस्तक्हें अपनों की आशाओं की थी
मेरे हौसले को जो मंजूर हुआ

आँखे जो आंसू बहाए
दिल उन्हें पीने को मजबूर हुआ
दिल जब दर्द से चिलाये
लब हसने को मजबूर हुआ

आखिर क्यों…..- प्रीती श्रीवास्तव

2 Comments

  1. Yashwant Mathur 22/12/2012
  2. Preety Srivastava Preety Srivastava 01/02/2013

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