जबकि, जानता हूँ…

रात को जब, लेटता हूँ,

तो छत पर तारे दिखते हैं,

और मैं, उन्हें गिनता हूँ।

जबकि, जानता हूँ, गिन नहीं पाउँगा।।।

 

सुबह मेरे ऑफिस के टेबल पर,

काग़ज के फूल खिले होते हैं,

और मैं, उन्हें सूंघ लेता हूँ,

जबकि, जानता हूँ, वो नकली हैं।।।

 

राह में जब, कोई भिखारी दिखता है,

ज़ेब से निकाल कर चंद सिक्के,

उसकी ओर उछाल कर,

बहोत गौरवान्वित महसूस करता हूँ,

जबकि, जानता हूँ,

उस दो रूपये के सिक्के से,

उसका पेट नहीं भरेगा।।।

 

रोज सुबह ऑफिस जाता हूँ,

रात देर से घर आता हूँ,

बनाता हूँ, खाता हूँ, और सो जाता हूँ,

जबकि, जानता हूँ,

ये मेरी ज़िन्दगी नहीं,

फिर भी, जीता हूँ।।।

 

हम हमेशा, वो सब कहते हैं,

समझते हैं, और करते हैं,

जो हम नहीं चाहते।।।

 

और, कभी नहीं सुनते,

समझते, कहते, और करते,

जो, हमारा दिल चाहता है।।।

2 Comments

  1. Yashwant Mathur 22/12/2012
    • Sunil Gupta 'Shwet' 23/12/2012

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