जलता रहा – हरिहर झा

खून उबला क्रोध में जलता रहा
भींच मुठ्ठी हाथ को मलता रहा

मैं गगनचुम्बी इमारत हो रहा
नभ के साये में सरकता जा रहा

कब्र बांधी स्वयं की सोया वहाँ
हड्डियों के साथ मैं गलता रहा

पूजने को आइने में देख कर
खुद को खुदा समझ छलता रहा

दुश्मनी जब दाल ही से हो गई
अपनी छाती पर तुअर दलता रहा

कौर भूखे को दिया जो भूल से
खूब पश्चाताप में जलता रहा

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