यों ही..कुछ.बात या बेबात…(बेरुखी की)!!!

यों ही..कुछ.बात या बेबात…(बेरुखी की)!!!

अफ़साना यह रहता था,हर तरफ़ प्यार का मंज़र दिखा ;
फूलों से लदी हर शाख मे, मोहब्बत का वास्ता दिखा !

केका गाई,मयूर नाचा,तितली उड़ी,मन मचल जाता था ;
भवंरेसे फिरते,गुन-गुनाते,चाँद-तारे तोड़ने का ज़ज्बा था !

मोहब्बत को रब जाना , प्रेम-प्यार को इबादत माना ;
मुस्कराहट पर मर मिटते,हर लहज़ा था मीठा-सुहाना !

क्या जाने क्या बात हुई,गुँजन सारे, बेज़ूवान हुवे ;
आँखों के नूर,अब उनकी आखों मे ही खटकने लगे !

वह लम्हा खोना नहीं चाहते थे , जब तुम्हारा साथ था ;
यह लम्हा जीना नहीं चाहते हैं ,जब तुम्हारा साथ छुटा !

तुम्हारी आँखें समझती थीं “दर्द”, मेरा भी एक रिश्ता ऐसा !
तुम्हारी नफ़रत का दर्द,”दर्द” से मेरा रिश्ता भी एक ऐसा !

लबों पर था नाम तुम्हारा, मेरे लबों पर नाम है तुम्हारा ;
हिफ़ाजत से दिल मे था,हिफ़ाजत से रखने का दिल मेरा !

हर-रोज़ मिलने की आदत से,न मिलने का यह वीरान सा सफ़र,
ख्वाहिश है,अगर ना मिली तो, खत्म कर दूँ ज़िन्दगी का सफ़र !

सजन कुमार मुरारका

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