यों ही..कुछ… बात या बेबात…….(विडंबना की)!!!

यों ही..कुछ… बात या बेबात…….(विडंबना की)!!!

कई कई शाम उनके नाम हम ने,कई कई पैगाम लिखे थे,
कसमे ,वादे,इज़हार किया था उम्र भर का साथ निभाने;

प्यार जताने, पत्थर पर उनके साथ नाम जोड़कर लिखा था,
आरजू थी हर प्रेमी,सदीयों ही हमारे प्रेम की दास्ताँ देखेगा!!

हमे क्या पता था, बेज़ान पत्थर पर यों क्यों वक्त जाया क़रते,
“दिल”दार “बेदिल हुवे,पत्थर पर फिर लिखा था ” प्यार मे”;

पत्थर से भी शक्त, कौशीश हमने की थी बेकार मे,
पत्थर पर फिर भी लिखा हमने, प्यार के जनून मे;

उमीदों के बादल उड़ गये, हव़ा ने दिशा बदल दी ,
एक “ना” से उन्होंने पूरी कहानी ही बदल दी ;

प्यारके हर पल मे पुरी ज़िन्दगानी लिखी थी,
दिल के कागज़ पर उनकी कहानी लिखी थी ;

छोटी सी “ना”, उन्होंने नई कहानी लिखली ;
हमने तमाम ज़िन्दगी की परेशानी लिख ली !

सजन कुमार मुरारका

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