यों ही ..कुछ …बात या बेबात, मिलन की !!

यों ही ..कुछ …बात या बेबात, मिलन की !!

मिलन की खुमार,चड़े हुवे नशे की सुमार,
नशे की सूरत उतरे पर मिलन की खुमार ?

एतवार अभी बाकी, खुश्बू रह गई मेरे पास;
यह मिलन के बाद का नशा है या एहसास ?

चमन मे खिलते फुल और मुरझा जाते ;
झोंकें हवा के खुश्बू फैलाते और मिट जाते !

कहते बहार आती और फिर चली भी जाती !
मिलन की बहार और खुश्बू मनमे बस जाती ।

तलवार कि तेज़ धार सी नयन की चले कटार;
अधरों की लाली, समाये लाल ग़ुलाब बेसुमार !

नख स शिख तक, करके प्रिये सोलह श्रृंगार ;
लाख कहो,ना-ना,मन मे है मिलन-इन्तज़ार!

मिलके,ज़ुदा हो गये खुदसे, हुस्न से था प्यार;
दिल ने दिल को कहा,अभी तो बाकी है दीदार !

बिज़ली सी कोंध जाती, अन्धेरी रात के सन्नाटे मे,
हुस्न का “ज़लवा”, ज्वालामुखी सा फ़ुटता मन मे !

सजन कुमार मुरारका

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