मोहब्बत

माना मोहब्बत करने का अपना एक अंदाज़ होता है
लोग करतें है मोहब्बत जब सारा जहाँ सोता है
पर एक मोहब्बत देखी हमने ऐसी भी
थी वह मोहब्बत ही चाहे थी जैसी भी
वह अँधेरी सी गली में बैठी तड़प रही थी
कोने में बैठी बेचारी सिसक रही थी
तन्हाई में अकेली बैठी रो रही थी
अपने फटे हुए कपड़े आंसुओं से धो रही थी
यही थी
गरीबी की पैसे से मोहब्बत
भूखे की रोटी से मोहब्बत
देश की जनसँख्या से मोहब्बत
और आम जनता की महंगाई से मोहब्बत
तो देखा आपने मोहब्बत ऐसी भी होती है.
मोहब्बत,मोहब्बत है जनाब चाहे जैसी भी होती है.
गुरचरन मेह्ता

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