यौवन ज्वाला

यौवन ज्वाला

लहर अंग-अंग मे,
नव यौवन की,
अठखेली करती लता-सी;
निज तन,निज मन भ्रमाय,
खिले-खिले फूल से,
वसन्त की हरियाली-सी;
हर अदा मे बवार देती फैलाय,
विभोर रास-रंग मे,
भ्रमित चित्त- प्रणय ज्वाला की,
भिन्न भिन्न उमंग से,
विचरे अभिलाषित पंख फैलाय;
मुखर या फिर मौन सी,
आनन्द विभोर मन ही मन मे;
पुलकीत हो बार-बार;
कम्पित अधर मुस्कान मे,
निश्चल नयन मे सपने सजाय;
रूप के मोहिनी जादु से,
प्रणय-गान गुंजन से,
लावण्य, कोमलता से इतराय;
श्रृंगार की मूक दृष्टि मे,
देखे नयन सचल ,
अपल हो दृष्टिमे स्तब्ध सी;
दिगभ्रमित आपने आप ही हो जाये!
छबि प्रियतम की,
ह्रदय मे बाँधकर,
तन की-लता सन्देशीका सी;
प्रथम प्रणय के भाव मे,
कैसे सहज,लज्जित चुपचाप;
विमुख अपने से,
निमेषहीन नयनों से तकाय!
सर्बसुख प्रियतम मे,
प्यार ही सर्वस्व प्रतीत पाय;
बहका-बहका विवेक,
अधीर और भी अस्थिर।
कुल मान-संस्कार निष्फल,निश्प्राय;
देह-मे रति झुलसे,
पंकिल हो चाहे सलिल-
या लघु लगे प्यार मे,
भावों की हर सीमा लाँघ जाय!
सुखद या मनोहर सी ,
व्यर्थ अभिमान से,
विचार-बुद्धी से सोच न पाय ।
शत बार गर्वित प्यार मे,
नभ से बरसती धारा सी,
धरती मे समाने को मचल जाय !

सजन कुमार मुरारका

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