खोया हुवा दिल

खोया हुवा दिल

आज अचानक बहुत दिन बाद,
मुलाकात हो गई;
मेरे खोये हुवे दिल से,
काफ़ी दिन से गुमशुदा था ।

कितनी मिन्नत,कितनी फ़रियाद,
खोजने की हद हो गई;
पूछा हाल-चाल दिल से,
क्यों इतने अर्सेसे वह मुझ से ज़ुदा था ।

आँखों मे भर पानी,सुनाया संवाद ,
प्यार की इन्तिहां हो गई;
प्यार किसी से हो गया था उसे ,
नासमझ दिल कब उसी मे खो गया था ।

जर्जर, मासुम से चहरे पर अवसाद,
जीने की तमन्ना खत्म हो गई;
टूटे हुवे दिल को सम्भालु कैसे,
“दिल्लगी” को उसने “दिल की लगी” समझा था ।

समुन्दर की रेत पर लिखा होता बरवाद,
लहरें आई और धो गई;
रेत का दोष इसमे कैसे,
नदानी थी दिल की,ग़लत जगह लिख था।

दिल को वापस लाने की थी कबायद,
अब जरूरत बड़ी हो गई ;
जीने को जी लेते लोग जैसे-तैसे,
पर रेगिस्थान मे वेवकुफ़ पानी खोज रहा था ।

सजन कुमार मुरारका

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