बोलो जब सोचकर बोलो !!

बोलो जब सोचकर बोलो !!

सुनो भाई साधो,कहते गुणी जन, हमको समझाय;
बोलो वचन मधुर ऐसे; जो मन को शीतल सुहाय,
कभी ना बोलो कड़वे बोल, अंतर्मन को बिंध जाय,
ज़ख़्म लगा तलवार से फिर भी उपचार किया जाय,
बातों के ज़ख़्म का “वैद्य धन्वन्तरि’ न कर सके उपाय,
कभी भी किसी का दिल दियो ना अकारण दुखाय ,
मन टूटे एक बार,लाख यत्न करो फिर जुड़ न पाय,
जुड़े भी जो दाग रहे,जीवन भर दिल मे बसा रह जाय ;
सदा मूर्खों ने फ़िज़ूल की बातों से दिया कोहराम मचाय ,
कह गये लोग पुराने,टक्का दे चाहे, उससे पीछा लो छुड़ाय,
ज्ञान की बातें उनके समझ न आय,व्यर्थ समय क्यों गवायें,
जैसे की सच है ,भैंस के आगे वीण बजाय, भैंस बेठी पगुराय ;
मूर्ख सखा से नहीं होता भला ,बुद्धीमान दुश्मन ही रखा जाय !
मुर्ख सदा दु:ख ही बांटे, बबुल जंहा उगे,संग कांटे उपजाय,
सरसता दे रिश्तों मे, प्रेम प्यार के बोल से जो जीवन बिताय,
कस्ट आये जब भी, मिल बाटकर ,अपने आप कट जाय !
अपनों का तिरस्कार करे, जो अपने अभिमान मे बोले जाय ,
अहंकारी का विनाश ख़ुद प्रभु ने किया, फिर उसे कोन बचाय ?
अपनों का अपमान से, मन की ज्वाला विवेक को भष्म कर जाय,
पता नहीं कब खोल दें ,अपमानित घर का भेद,विनाश दें कराय !
बोलो जब भी सोचकर बोलो,मीठा बोलो,दूजा न कोई सरल उपाय,
ज्ञानीजन कहतें; गूंगे के दुश्मन कम होत,क्यों की वह बोल न पाय,
“सजन” ताहे कहे ,ऐसे वचन बोले,जो किसी का दिल ना दुखाय !

*सजन कुमार मुरारका *

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