रुसवाई ने अब देख लिया है मेरा घर भी….

इस पेड़ में एक बार तो आ जाये समर भी ,
जो आग इधर है कभी लग जाय उधर भी ,

कुछ मेरी अना भी मुझे झुकने नहीं देती ,
कुछ इसकी इजाजत नहीं देती है कमर भी ,

पहले मुझे बाजार में मिल जाती थी अक्सर ,
रुसवाई ने अब देख लिया है मेरा घर भी ,

इस वास्ते जी भर के उसे देख न पाए ,
सुनते हैं कि लग जाती है अपनों की नजर भी ,

कुछ उसकी तवज्जो भी नहीं होती है मुझ पर ,
इस खेल से कुछ लगने लगा है मुझे डर भी ,

उस शहर में जीने की सजा काट रहा हूँ ,
महफूज नहीं है जहाँ अल्लाह का घर भी !!

6 Comments

  1. basantnema 23/11/2012
  2. Sunil Gupta 'Shwet' 04/12/2012
  3. amita 12/09/2013
  4. शिवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव 10/04/2014
  5. Dr.Savita Saurabh 17/08/2014
  6. Gurpreet Singh 19/12/2015

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