मुक्ति (सेदोका)

१.
स्कूली दिन,
उभरता व्यक्‍तित्व,
उठती आकांक्षायें।
निर्दोष मन,
कल्पनाशील दिल,
खुला मस्तिष्क मेरा।

२.
नजरें पड़ीं
उनपर जबसे
नींद गयी, बेचैन
मन मंदिर
में नृत्य करे मोर;
पल हुए आपके।

३.
राज करतीं
आप, मेरे दिल में
सिंहासन आपका,
मोहित मन
करे आपकी आँखों
को पढ़ने की इच्छा।

४.
दिल धड़का
जब आँखों से आँखें
मिलीं और एक हुईं;
मन मुस्काया
दृगों ने चुम्बन लिया,
चुराकर चेहरा।


पता नहीं है
तुम्हें कि मर गया
था उस दिन जब
हँसी थीं तुम।
अधरों को खोला था
श्‍वेत दंत पंक्तियाँ।

६.
झलकायी थीं
बिजली चमकी थी
गिरी थी दिल पर
उन दसनों
के धवल प्रकाश
में डूब गया था मैं।

७.
कभी सोचा है
तुमने कैसे किसी
को जाल में फाँसा है,
तुम अंजान!
आग लगाया, जादू
कर कैद में डाला।


तुम नहीं हो
अब हाड़ मांस की
काया क्षणभंगुर
परम प्रेम
व पूजा की आराध्या
आनंद की सूरत।


प्रेम होता है
मोक्षकर्त्ता आनन्द,
मिटता नहीं कभी।
रहता घुला
पोर-पोर वदन
में ऊर्जा की तरह।

१०
ढाई अक्षर
प्रेम का पढ़े और
पंडित होये ब्रह्म
को पहचाने
मुक्ति, मोक्ष लेकर
परमानंद पाये।

११.
व्यक्ति रूप
को ब्रह्म रूप पर
प्रत्यारोपित कर,
प्रेम सुमार्ग
पर रखे कदम,
आगे बढ़े तैरने
को भवसागर को।

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