तुम

तुम

साँवला रंग,
चमक चेहरे की
लुभाती मुझे।

आँखें खोजतीं
तुम्हें हर जगह,
हर कदम।

पवन चाल
से जब तुम आतीं,
नाचता मन।

धड़के दिल
करता धक-धक
फूलती साँसें!

लंबी उच्छ्‌वास!
नजरें तिरछी कर
देखूं मैं तुम्हें।

न जाने कब
उतर गयीं तुम
मेरे मन में।

धीरे से चल
पग पगडंडी पर
रख रख के।

नर्म तलवे
रखकर गोदी में
सहलाऊँ मैं।

काया काँपे है
सिहर-सिहर के
रूपशिखा से।

सोचता मन
कैसे बनाऊँ तुम्हें
अपनी प्रिया।

लोगों की आँखें
तुम्हें न देखें, सोचूँ
अपने मन।

मूरत बना,
छोटी करके, रखूँ
दिल के आला।

नहीं चाहता
तुम्हें छोड़ बाहर,
खतरा ले लूँ।

आवेशित हूँ
और चाहूँ तुमको
पूरा रख लूँ।

अपने दिल
व मन मंदिर में
बुत बनाके।

पूरा पूरा सा
रख लूँ और दीप
जलाऊँ नित

प्रेम का प्रातः,
संध्या, रात व दिन
व हर पल।

नाचूँ मूर्ति के
चारों ओर, जलाऊँ
बाती प्रेम की।

मुझे नहीं है
मालूम कि लौ लगी
एक तरफ

कि दूजा दिल
भी घायल शर से
अंदर तक।

पर देखी है
मैंने आँखें आपकी
आँखों में मेरी।

समझ गया
आग दोनों दिलों में
लगी हुई है।

न बोला मैं, न
बोला आपने, लबों
पर नाम से

एक दूजे से।
कनखी से देखे हैं
हम दोनों ने।

लिखा है प्रेम
की दास्तान गहरी
छू गया मन।

बिन बोला मैं
बिन बोले आप भी
कैसे पहुँचें

एक-दूसरे
की बात कैसे कहें!
उठायी जब

आपने आँखें
मेरी मुश्किल घड़ी
में, मुस्कुराईं।

हर लीं दर्द,
सुकून दिया और
चैन आ गया

बिन बोले ही
मैं हो गया आपका
व आप मेरी।

नयनभाषा
समझ कर अब
डूब गया मैं

आपकी याद
आपके खयालात
में खो गया मैं।

कई बरस
बीत गये आपको
बिन देखे ही।

फिर भी आप
बैठी हैं मेरे मन
के आँगन में

वैसी की वैसी।
ज्योत्स्ना सी स्निग्ध, नर्म
और शीतल।

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