ग्रंथालयों में महाकवि

k ravindra ki painting

कवि बतियाता है
सिर्फ मित्र-कवि से
चंद कूट संकेतों के ज़रिए
जिस तरह
एक किसान, दूसरे किसान से
एक महिला, दूसरी महिला से
एक चिड़िया, दूसरी चिड़िया से

कवि
किसान के पास नहीं जाता
जबकि किसान चाहता गुनगुनाना
उसके गीत
हल-बैलों की लय-ताल-चाल में।

कवि
जाता नहीं श्रमिक के पास
जबकि श्रमिक चाहता उच्चारना
मशीनों की खटर-पटर में
शब्द-लय पेवस्त करना।

कवि
बैठता आजकल
धन्ना-सेठ प्रकाशकों के संग
आलोचकों-सम्पादकों के चूमता क़दम
सत्ता के गलियारे
बांधे हाथ
खीसें निपोरे
खेलता इक खेल
स्वाभिमान, प्रतिभा और अस्तित्व को
लगा दाँव पर

कवि
जीवित रहना चाहता
ग्रंथालयों की सीलन भरी उबासियों में
इतिहास पुरुष बनने का स्वप्न
हर लेता उसकी उम्र भर का चैनो-सुकून

कवि
अपने भोथरे शब्दों को
तिकड़म से
कराता सिद्ध-प्राणवान
जोड़-तोड़ से
बन जाता
इस सदी का महाकवि!

Leave a Reply