शकीला की छठवीं बेटी

 

k ravindra ke chetrankan

k ravindra ki painting 2012

‘लेबर-रूम’ के बाहर
खिन्न हैं आयाएं
नर्सें ख़ामोश
आज की ‘बोहनी’ बेकार हुई
‘ओ गॉड, ये ठीक नहीं हुआ!’
शकीला इस बार भी
पुत्र की आस में
नौ माह तक
ढोती रही एक ‘कन्या-भ्रूण’
उसके शौहर ने क्या समझ रखा है
शकीला की कोख को एक प्रयोगशाला
जिसमें प्रतिवर्ष किया जाता प्रयोग
एक ‘चांस’
कि शायद इस बार
कुलदीपक हो उत्पन्न
कि शायद इस बार
मिल जाये ज़िल्लत से छुटकारा
सच ही तो है
कि बेटियों की माँ होना
दुर्भाग्य का पर्याय है

‘जल्दी सफाई का काम पूरा करा!’
सिस्टर थॉमस इसी तरह है चिड़चिड़ाती
जिस दिन कोई ‘कन्या’ संसार में आती
कुछ पूछने पर बिगड़ जाती
‘क्या ज़रूरत है किसी टीका-वीका की
जी जायेगा बच्चा
लड़की जात जो ठहरी।’

शकीला की मनोदशा देख
आयाएं हैं उदास
लगता है
रक्ताल्पता की शि‍कार
पतली-दुबली शकीला
पागल हो जायेगी
लगातार छठवीं बार
प्रसव-पीड़ा सहकर
पुत्र-रत्न से वंचित माँ का दुख
क्या समझ पायेगा कोई कवि!

बगल मे पड़ी
नवजात कन्या रोने लगी
शकीला के ममता नहीं उमड़ती
शकीला उसे दूध नहीं पिलाती
बूढ़ी सास माथे पर हाथ धरे
टिकी बिस्तर के पैताने
हर बार की तरह इस बार भी
जिसकी भविष्यवाणी ग़लत साबित हुई
जबकि तमाम लक्षणों के मुताबिक
बहू ने जनना था पोता
वह नाराज़ है ख़्वाज़ा ग़रीब नवाज़ से भी
जिन्होंने पूरी न की मनौती
शकीला आँखें बंद किये
लेटी चुपचाप मुर्दा सी

तभी आ गई नज़मा
शकीला की बड़ी बेटी
उसने झट उठा लिया गोद में
नवजात कन्या-शि‍शु
लगी पुचकारने उसे
रोती बच्ची उसकी गोद में आकर
लाड़-दुलार पाकर
चुप हुई
जैसे उसने पा लिया हो ‘मुहाफ़िज़’ कोई।

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