अब्बा

k ravindra ke chitrankan

कौन कहता है
वह टूट गए हैं
ज़रा देखिए ध्यान से
बढ़ती उम्र के कारण
वह कुछ झुके ज़रूर हैं
झुकता है जैसे कोई फलदार पेड़
झुकती जैसे फूलों भरी डालियाँ

अब्बा पर्याय हैं
आँगन के उस पीपल का
जो जाने कब से
खड़ा है अकेला
निहारता
सिद्धबाबा पहाड़ी पर बने मन्‍दि‍र को
बदलते मौसम
धूप-छाँह के खेल
दिन-रात की कारीगरी में लिप्त प्रकृति
डिगा नहीं पाई
अब्बा का मन

अवकाश प्राप्ति के बाद भी
अब्बा हैं वही अध्यापक
जिसे समाज को शि‍क्षित करने का
महती-उत्तरदायित्व मिला है
इसीलिए शायद अब भी
वह चाहते सिखाना
अनुभवों के सिलेबस से
व्यवहारिक ज्ञान की वर्णमाला

जने क्यों अक्सर अब्बा
दाहिने हाथ की तर्जनी
हिलाते रहते आजकल
लगता है किसी
पेचीदा सवाल को
मन ही मन करते हैं हल

अक्सर याद करते आजकल अब्बा
वे दिन
जब उनकी बेंत की डर से
पाठशाला नहीं आना चाहते थे छात्र
और मार खाकर जो पढ़ गये
वे सब आगे बढ़ गये।
मिल जाते आज भी
ऐसे विद्यार्थी
झुककर करते प्रणाम
गुरु-दक्षिणा स्वरूप
सादर प्रस्तुत करते पान
चौ़ड़ा हो जाता
अब्बा का सीना
कहते, एक शि‍क्षक
जीवन में यही तो कमाता है।

वो भी एक ज़माना था
जब अब्बा की परछाईं से भी
डरते थे हम
भागते थे कोसों दूर
उनके थप्पड़ खाकर
कई बार मूत दिया करते थे
पेंट में हम
शायद अम्मी भी डरती थीं उनसे
आज हमारे बच्चे
हमारे कपार पे चढ़कर
पूरी करवा लेते अपनी
जायज़-नाजायज़ मांग
तब हम कहाँ सीधे
अब्बा से मांग पाते थे
कुछ भी
अम्मी के ज़रिए पहुँचती थीं बातें तब
अब्बा के पास

मुझे अपने अब्बा पर है गर्व
क्योंकि दोस्तों के बूढ़े बाप
मिलने पर
खा जाते दिमाग
अपने युवा बेटे-बहू की शि‍कायतों का
कच्चा चिट्ठा खोल, कर देते हलकान
बताते कि उनके बच्चे
निकले सब बेईमान…

जबकि नहीं करते अब्बा
किसी राहगीर को परेशान
नहीं सुनाते किसी को
बेटे-बहू की नाफ़रमानियों की
कचड़ा दास्तान

जबकि वे चाहें तो
क्या उनके पास
नहीं हैं उपलब्ध
कई आख्यान…???

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