बिछोह -घड़ी (चोका)

डॉ०भावना कुँअर

सँजोती जाऊँ आँसू

मन भीतर

भरी मन -गागर।

प्रतीक्षारत

निहारती हूँ पथ

सँभालूँ कैसे

उमड़ता सागर।

मिलन -घड़ी

रोके न रुक पाए

कँपकपाती

सुबकियों की छड़ी।

छलक उठा

छल-छल करके

बिन बोले ही

सदियों से जमा वो

अँखियों का सागर।

 

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