हाइकु ( पर्यावरण)

डॉ०भावना कुँअर

1

इत्र नहाई

सोने से लदी फदी

खुश थी ज़मीं  ।

2

नर्म औ सौंधी

हवाओं की पिटारी

खोलती चली ।

3

घोलता कौन

पिटारी में जहर

पूछती चली ।

4

निरुत्तर हो

साँस की नली,साफ

करती चली ।

5

रस घोलती

पंछियों की टोलियाँ

निकल पड़ी ।

6

अँधड़ कैसा ?

जो मधुर स्वरों में

नीम है घुली ।

7

छीन ले गई

कानों की शक्तियाँ भी

एक न चली।

8

मन भी सदा

नये-नये सृजन में

रहा था घिरा ।

9

अब तो सदा

तनाव की छतरी

रहती तनी ।

10

मिलके हमें

महकता आँगन

लौटाना होगा ।

11

ए०सी०से दूरी,

घने पेड़ की छाया,

लाना ही होगा ।

12

पृथ्वी की गोद

हरियाली -शृंगार

सजाना होगा ।

13

पहना है जो

आधुनिकता चोला

जलाना होगा ।

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