“धन्यवाद का सन्देश “

“धन्यवाद का सन्देश ”
मैं अनजान कैसे तेरी राह मे आया था ,
और न जाने कब तेरे दिल में समाया था,
मेरी राह तो बिराने की तरफ़ जाती थी!
दोस्त! जाने क्यों तुमने अंगुली थामी थी !
जब भी ख्याल आये,मैं सोचता रहता था,
कभी किसी समय का याराना या रिश्ता था !!
क्यों शमा बनके मेरी दुनिया रोशन करता है,
ख़्वाब की मानिंद हर वक़्त दिमाग में रहता है.
वो बहता रहता मेरे जिस्म में ज़ोश बनकर ;
वो प्रज्वल्लित करता मेरे मन को आग़ बनकर ।
मेरे पास नहीं, हरदम मगर मेरे साथ रहता है |
ये बात सच है फूल सा बगिया को महकता है !
मेरे ग़म का सागर उसके हौसले से निबाह था ,
निबाहने तो रास्ते में साथ साथ मेरे चला था ।
मेरी क़मीज़ स्याहियों की कालिख़ से कालि थी |
शाबासी के लफ्ज़ों से उसने धुप सी चमकाई थी ;
मुझे रोशन करने मैं वह किरन-किरन में बिखर था,
मेरे लेखन मे “सभीका”का “सरयू “सा योग था !!

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