रेह में कल्ले

देवगाँव से मेहनाजपुर लौटते वाली
रात की आख़िरी बस
तेज़ी से भागती है मगर
हर पड़ाव की सवारियों को उठाती है
और बिना पड़ाव के भी
लोगों के
उदास, बुझे और अकुताये हुए चेहरों की रौनक बस।
आंधी का सामना करती हुई लालटेन सी उनकी आशा
जो किसी भी क्षण भक से बुता सकती है
न लौटने की ख़बर पा
जो कभी-कभार होता है।

बस चलती है
कंडक्टर भाड़ा वसूल करता है
वह पैसे नहीं गिनता
गिनता है लोगों के माथे पर बल खाई रेखाएँ
और उनका अंकगणित।
रेखागणित कहाँ चलकर अंकगणित हो जाता है
वह जान गया है
कूबा की रेह और ऊसर ने
मौलवी साहब के सिखाए सवालों से हटकर
बहुत सारे सवाल सिखाए हैं।
बस की इस खड़खड़ाहट में भी
कहीं खैनी ठोंकने की थाप उसे साफ सुनाई पड़ जाती है
और उसके मांगने से पहले ही
उसकी ओर बढ़ा हुआ हाथ
उसमें एक आत्मीयता भर देता है
रेह में भी कल्ले फूटते हैं।

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