भावहीन

दुख की तरकश से निकला
ऊफ्‌ का एक उच्छ्वास !
मन की गहनता,
बेबसी के स्याह लबादे पहन,
अंधकार में बदल जाती है ।
चारों तरफ,
फैला हुआ एक जाल,
बनाये रखता है
जीने की आस ।

इन जालों और जंजालों के बीच
फँसा हुआ मैं,
अशक्त,
बेबस सा पड़ा हुआ हूं ।
न जाने कब से,
ऐसे ही अड़ा हुआ हूं ।

कुछ लोग मुझे नोचते हैं,
खसोटते हैं,
सर्द हो गयी हैं आँखें मेरी,
भावहीन चेहरा,
फिर भी,
मैं मुस्कुरा देता हूँ ।

यह मुस्कुराहट,
शायद मौत की सुरसुराहट है ।
लगता है मेरे अन्दर का कुछ मर गया है ।

मैं,
लाशों से फैली
बदबू में जीना सीख गया हूं ।
इस अजीब सी,
सड़ी-गली व्यवस्था की
गन्ध तो अब सुगन्ध बन गयी है ।

इस सड़ी सी व्यवस्था को,
इस बदबू को,
जिलाने हेतु,
कुछ लोग अड़े हुए हैं ।
श्मशान में भी तो,
कुच्छ जिन्दा जन्तु पड़े हुए हैं ।
मैं भी तो,
इस बदबू और सीलन भरे
कमरे का मालिक
बनना चाह्ता हूं ।

बेहतर है,
मैं इस बदबू और दुर्गन्ध को
हटाने में
अपने को लगा दूँ ।
कूड़ॊं की पहरेदारी से,
अपने को बचा लूँ ।

कूड़ों के पहरेदार !
इस बदबू और सीलन भरे
कमरे का मालिक
बनने के लिये,
लाखों की कतार !

न जाने क्यों लोग,
अपनी रूह की आवाज,
जीवन के लय और साज
को मिटाकर,
इस कीचड़ पर बिछे कालीन
पर बैठना चाहते हैं?
क्या मखमल की चादर के
नीचे का कूड़ा,
कूड़ा नहीं होता ?

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