ग़ज़ल

नजरें मिला के नजरें फिराना ,ये हमने अब तक सीखा नहीं हैं
बादें भुलाकर कसमें मिटाकर ,बो कहतें है हमसे मुहब्बत यही हैं…

बफाओं के बदले बफा न करना ,ये मेरी शुरू से आदत नहीं हैं
चाहत भुलाकर दिल को दुखाकर ,बो कहतें है हमसे मुहब्बत यही है ..

बफाओं के किस्से सुनाते थे हमको,बादें निभाएंगे कहते थे हमसे
मौके पे साथ भी छोड़ा उन्ही ने ,अब कहते है हमसे जरुरत नहीं है

कहतें है दुनिया में मिलता है सब कुछ ,गम ही मिला है मुझे इस जहाँ से
कहने को दुनिया बाले कहें कुछ,मेरे लिए तो हकीकत यही है..

खुश रहें बह सदा और फूले फलें ,गम का उन पर भी साया न हो
दिल से मेरे हरदम निकलते दुआ है,खुदा से मेरी इबादत यही है..

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

One Response

  1. Madan Mohan Saxena 08/11/2012

Leave a Reply