ग़ज़ल(दर्द)

वक़्त की रफ़्तार ने क्या गुल खिलाया आजकल
दर्द हमसे हमसफ़र बनकर के मिला करते हैं…

इश्क का तो दर्द से रिश्ता ही कुछ ऐसा रहा
फूल भी खारों के बीच अक्सर खिला करतें हैं

डर किसे कहतें हैं , हमको उस समय मालूम चला
जब कभी भूले से हम खुद से मिला करतें हैं

अंदाज बदला दोस्ती का कुछ इस तरह से आजकल
खामोश रहकर, आज बह हमसे मिला करते हैं

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

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