नज्म

नज्म

प्यार से प्यार करना गुनाह है अगर
तो जुर्म ऐ मुहब्बत को बार बार हमने किया
इबादत का हक़ है मुयस्सर सभी को
सो इबादत का हक़ हमने लिया

अपने खुदा के इक दर्श पाने की खातिर
हर पल कयामत का इंतजार हमने किया
बसा के सूरत अपने दिल में खुदा की
हमने दिल से ना पार उनको जाने दिया

मेरे अपने खुदा को जो भी प्यारा लगे
उन सबसे बेशुमार प्यार हमने किया
देख दीवानापन और चाहत को मेरी
बोले अदाओं ने बेकरार हमको किया

प्यार की रोशनी से है रोशन जहाँ
सो कहता मदन दिल हार हमने दिया.

काब्य प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना

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