मुझको पुकार

तू एक बार मुझको पुकार
बस एक बार मुझको पुकार।

मन के साध न सध पाये
यौवन की हाला रीत गयी
स्वर भंग आलाप न ले पाया
निष्ठुर खामोशी जीत गयी
थक गया एकाकी थाम मुझे
मैं इस जीवन से गया हार।

कितने हलाहल वर्ष पिये
घन-तिमिर से निकला ना प्रभात
कितने ही झंझावातों ने
आ चूमे ये रूखे गात
अब चलाचली की बेला है
आ जाने दे कुछ तो निखार।

सौ-सौ जन्मों के पुण्य कहाँ
कि हो पात तुमसे मिलाप
नियति से उपहार मिला है
रंग-रंग में मुझको विलाप
अब प्रणय यज्ञ सध जाने दे
धुल जाये सब मन के विकार।

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