ग़ज़ल (बात होती है)

गैरों से बात अक्सर बह, हंसकर किया करते है
हमसे बात जब होती इशारों से बात होती है

यादों की हंसी गलियों में, पाया जब कभी खुद को
कहना क्या है उस पल का चाँद तारो से बात होती है

हंस कर गम बुलाने की कोशिश भी करी हमने
ख़ामोशी में गर्दिश के सितारों से बात होती है

तन्हा होकर के महफ़िल में सुनी है गूँज जब हमने
उस पल को अपनी दहशत की दीवारों से बात होती है

मर्ज ऐ इश्क़ को सब ने गुनाह समझा गुनाह जाना
दुनिया में तो बस गुनाहगारो से बात होती है

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

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