अस्थिदान

वृत्रासुर के
अत्याचार से त्रस्त हो,
देवता लोग पहुँचे
ब्रह्मा के पास।
और गुहार की
तथा आर्त्तनाद किया
कि अब
नहीं सहन होता
वृत्रासुर का त्रास।
ब्रह्मा धीमान हैं
उन्होंने बँधाया
देवताओं को आस।
और कहा
कि वृत्रासुर को है
किसी तेजस्वी पुरुष के
रक्त की प्यास।
वह माँग रहा है बलिदान
एक महात्मा का।
उसकी अस्थियों से
बनेगा एक वज्र
जिससे होगा
असुरों का नाश।

अब क्या चाहिए?
’न हर्रे लगे, न फिटकरी,
रंग चोखा होय।’
न अपनी जान जानी है,
न धन लगाना है।
बस एक निर्दोष, निस्पृह
पवित्र आत्मा का
शरीर छुड़वाना है।

पहुँच गये देवराज
दधीचि की सेवा में।
संसार के कल्याण की
दुहाई दी
और उनकी अस्थियों की
माँग की।
फरमान सुनाया
उनकी आत्मा की
रिहाई की।

संसार सुखी रहे,
मैं अकिंचन
रहूँ न रहूँ।
ऋषि ने दिये अपनी जान
और बचा लिये
देवताओं के प्राण।
लोगों ने हर्षनाद किया
“राक्षस मारे गये।
देवराज इन्द्र की जय!”
उन्होंने अपनी चतुराई से
एक ऋषि का शरीर लेकर
उनके प्राणों की रक्षा की थी।

भूल गये लोग दधीचि को।
अस्थिदान दान नहीं
देवराज की धीमता और
राजनीति थी।

हर राक्षस के
विनाश के लिए
एक महात्मा के
प्राणों की
आहुति होती है।
और याद
उस महात्मा की नहीं,
उस विनाश के बाद की
शांति का
उपभोग करनेवाले
की रहती है।
बज्र दधीचि के
अस्थियों का नहीं,
इन्द्र का वज्र कहलाता है।

अस्थिदान बन्द नहीं है।
अब भी इंद्र पर
संकट आते हैं,
नहीं तो वे
खुद बुलाते हैं
और कई इंद्र
आज कई करोड़
दधीचियों के शरीर से
मांस नुचवाते हैं
और
अस्थियाँ ले जाते हैं
जिससे
अस्त्र बनवाते हैं
और टकराते हैं
एक अन्य वज्र से
जो दूसरे
दधीचियों की अस्थियों
से बना है।

अस्थिदान अनवरत चालू है।

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