ग़ज़ल(खामोश)

हम आज तक खामोश है और बो भी कुछ कहते नहीं
दर्द के नगमो में हक़ बस मेरा नजर आता है

देकर दुयाए आज फिर हम पर सितम बो कर गए
अब क़यामत में उम्मीदों का सवेरा नजर आता है

क्यों रोशनी के खेल में अपना आस का पंछी जला
हमें अँधेरे में हिफाज़त का बसेरा नजर आता है

इस कदर अनजान है हम आज अपने हाल से
हकीकत में भी ख्बाबो का घेरा नजर आता है

ये दीवानगी अपनी नहीं तो और क्या फिर है मदन
हर जगह इक शक्श का चेहरा नजर आता है

ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

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