बाबूजी का चश्मा

उनमुक्त गगन मे उड़ते हुए पंछी
कल-कल ,छल-छल बहती नदिया की धारा
अक्सर याद आता है मुझे
गरजते हुए मेघों की गड़गड़ाहट
वो आँगन में नीम पे पड़ा झूला
अक्सर याद आता है मुझे
बाबूजी का चश्मा, वो डंडा
माँ के हाथों की सिकी चूल्हे की रोटी का स्वाद
अक्सर याद आता है मुझे

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