शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है…

ईमान फिर किसी का नंगा हुआ है.

शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है..

वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.

ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है..

शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है..

फिर से गलियां देखो खूनी हुई हैं.

गोद कितने मांओं की सूनी हुई हैं..

उस इन्सान का, क्या कोई बच्चा नहीं है?

वो इन्सान क्या, किसी का बच्चा नहीं है??

हाँ, वो किसी हव्वा का ही जाया है.

वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.

ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है…

लोथड़े मांस के लटक रहे हैं.

खून किसी खिडकी से टपक रहे हैं..

आग किसी की रोज़ी को लग गयी है.

कोई बिन माँ की रोजी सिसक रही है..

हर एक कोने आप में ठिठक गये हैं.

बच्चे भी अपनी माँओं से चिपक गये हैं..

इन्सानियत का खून देखो हो रहा है.

ऊपर बैठा वो भी कितना रो रहा है..

दूर से कोई चीखता सा आ रहा है.

खूनी है, या जान अपनी बचा रहा है..

और फिर सन्नाटा सा पसर गया है.

जो चीख रहा था, क्या वो भी मर गया है??

ये सारा आलम उस शख्स का बनाया है.

वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.

ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है…

वक्त पर पोलीस क्यों नहीं आई?

क्योंकी, ये कोई ऑपरेशन मजनूं नहीं था..

नेताओं ने भी होंठ अपने बन्द रक्खे.

क्योंकि, खून से हाथ उनके भी थे रंगे..

सरकार भी चादर को ताने सो रही थी.

उनको क्या, ग़र कोई बेवा हो रही थी..

पंड़ित औ मौलवी भी थे चुपचाप बैठे.

आप ही आप में दोनों थे ऐंठे..

हमने भी, अपना आपा खो दिया था.

जो हो रहा था, हमने वो खुद को दिया था..

दोषी हम सभी हैं, जो दंगे हुए हैं.

ईमान हम सभी के ही, नंगे हुए हैं..

खून से हाथ हमसभी के ही, रंगे हुए हैं…

पर दंगे का वो सबसे बड़ा सरमाया है.

वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.

ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है…

चंद सिक्कों की हवस, और कुछ नहीं था.

हिन्दू ना मुसलमां, कोई कुछ नहीं था..

हिन्दू नहीं, जो इन्सान को इन्सां ना समझे.

मुसलमां नहीं, जो इन्सानियत को ईमां ना समझे..

आपस में लड़ाये धर्म है हैवानियत का.

प्यार ही इक धर्म है इन्सानियत का..

हम कब तलक ऐसे ही सोते रहेंगे?

भड़कावे में गैरों के, अपनों को खोते रहेंगे??

बेशर्मों से तब तलक हम नंगे होते रहेंगे?

बहकावे में जब तलक दंगे होते रहेंगे!! बहकावे में जब तलक दंगे होते रहेंगे!!!

मेरे शहर फ़ैज़ाबाद में हुए दंगे से द्रवित और दुःखित –  सुनील गुप्ता ‘श्वेत’

Leave a Reply