तपन न होती

स्मृतियों के हलाहल को
आँखों के खारे पानी से
काश कि गीत नहीं लिखता मैं
पीड़ाएँ निर्वसन न होतीं!

अब तक जाने क्या था मैं औ’
अब जाने क्या हो बैठा हूँ
ऐसा गीत दिया तुमने की
मैं अपना स्वर खो बैठा हूँ
अपयश की ओढ़े चादरिया
हुई कामना हर इक जोगी
काश प्रीत में बिका न होता
उम्र मेरी यों रेहन न होती!

तुझको क्षण-भर पाकर, चन्दन
हो गई थी तन की मधुशाला
अब जाने कब पूजा होगी
अब जाने कब मिले शिवाला
देखो साथ निभाए कब तक
गंध प्रतीक्षा के फूलों की
तेरी याद नहीं जलती तो
जिगर में मेरे तपन न होती!

जलन, माँगकर दीप ले गए
चुभन, बबूलों को है बाँटा
जब जीवन के चुने सफों पर
नाम तुम्हारा, लिख-लिख काटा
पनघट से मरघट ले आया
ढो अपने पाँवों पर मिट्टी
तुम अपना दामन धर देते
अर्थी ये बिन कफन न होती!

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