खामोश पल की चाह

मंजिल जब एक हो तो

अजनबी बन कर कैसे चलें?

उमस भरी दोपहरी-सी

बेचैन जिन्दगी कैसे ढ़ले?

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कभी गम दिया कभी दी खुशी,

कभी मुक्ति के साथ दी बेबसी

सीने  पर  सलीब  बाँध  कर

कोई  चन्द  पग  कैसे  चले

प्रकृति में पसरा हुआ

एक  मौन  आमंत्रण

मुट्ठी भर छाँह और इक

खामोश पल की चाह

मुझे  इन  हवाओं  ने  भी

बार-बार  खूब  छले।

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