उस मोड़ पर

रात  भर  फैला   रहा सन्नाटा,

फैला रहा अँधेरा

ज्वन अंकुरित हुआ

उठ कर देखा उस मोड़ पर तुम खड़े थे

जहाँ उठ रहा था सूर्य का सुर्ख गोला ऊपर

धीरे……..धीरे………धीरे………..।

कुहासे में सब कुछ  ढ़क गया था

पेड़, मकान, आदमी, अरमान था

तो बस कुहासा

लिपटी हुई नीरवता

उस मोड़ पर तुम खड़े थे

जहाँ पिघल रहा था कुहासा

और बह रही थी नीरवता।

स्थिति- बोध

कैसे हो गयीं मेरी आँखें अजनबी

कैसे हो गये मेरे दोनो हाथ मुझसे अलग

क्या हुआ मेरे चेहरे को जो

मेरा अपना नही रहा

मेरे दिल में ये र्दद कब उठा

कब?

कब शुरू हुआ मेरे शरीर का

एक-एक हिस्सा मुझसे

अलग होना

कब तक

ये  सिलसिला चलेगा

मुझे पूरा विश्वास है अब भी

कि मेरा एक

सम्पूर्ण शरीर था।

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