जमाना

जमाने मे कोई सानी नहीं हैं

जिगर मे जिसके बेमानी नही हैं

दिवानापन शहीदो सा है जिसका

उसकी कोई कदरदानी नही हैं

झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं

सियासत हैं ये नादानी नहीं हैं

दिलों को बाटते मतलब को अपने

वतन की आबरु पहचानी नही हैं

किस कदर बिगडे हैं हालाते वतन

रोटी बिजली हवा पानी नही हैं

जिसको देखो हवा मे उड रहा है

जिन्दा है बस जिन्दगानी नही है

कुछ के हिस्से मे कायनात सारी

लुटने की नीयत दानी नही है

सुर तुलसी कबीरा सा लिखे जो

पुष्पक ऐसी कोई बानी नही है

तबाही क मन्जर हो जिसकी आदत

सिरफिरा है वो हिन्दुस्तानी नही है

जिस्म जल्लाद आंखों मे बगावत

मुल्क परस्ती कि निशनी नही हैं

2 Comments

  1. yashoda agrawal 22/10/2012
  2. Yashwant Mathur 24/10/2012

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