नाराज़ हमसे क्यूं है तू ऐसा हुआ है SALIM RAZA REWA

!! ग़ज़ल !!
नाराज़ हमसे क्यूं है तू ऐसा हुआ है क्या
हम को ज़रा बतादे हमारी ख़ता है क्या

उतरा हुआ है चेहरा ये आंखे भी लाल है
तनहा तमाम रात तु रोता रहा है क्या

उजड़े हुए मकान हैं टूटे दयार है
वीरान क्यूँ चमन है ये आई बला है क्या

ऐसा कहाँ है कोई जो खुद आके ये कहे
मैं हूँ गुनाहगार बताओ सज़ा है क्या

क्यूं उँगलियाँ उठाते है सब मेरे नाम पे
मैंने वफ़ा निभाई ये मेरी ख़ता है क्या

रुक्सत के वक्त्त हंसना मुनासिब नही कभी
बेटी का दर्द तुमने बताओ सहा है क्या

पहले घसीट ले गए फासी के तख्त तक
फिर पूछते हैं आखिरी तेरी “रज़ा” है क्या
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बिजली चमक रही है इसी एतराफ़ में
देखो नया मकान किसी का बना है क्या

इक झुण्ड शोर करता हुआ घूम रहा है
बेजान सा परिंदा वहां पर पड़ा है क्या

गम है उन्हे य कोई उन्हे दे गया दग़ा
रोता है जार जार कोई खो गया है क्या

मैंने तुम्हारे नाम दिलो जान भी किया
लेकिन न जान पाया की तेरी रज़ा है क्या

221 2121 1221 212
शायर सलीम रज़ा 2000 to 10.12
9981728122

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