बेटे की ख्वाहिश

बेटे की थी ख्वाहिश, बेटी ने धन्य बना दिया।

ये घर जो था मकान, उसको महल बना दिया।।

 जब भी रहा उदास, दुखी दुखी बुझा हुआ।

 नन्हे हाथों ने छू के, चेहरा मेरा खिला दिया।।

 इक बार क्रोध में, हाथ मेरा उठ गया।

लगा तो नहीं आपको, कहके मुझे रूला दिया।।

दुख हो या कोई पीडृा या भेद कोई मन का,

 छुपा के अश्क अपना, खुद मुस्कूरा दिया।।

 बीडृी शराब और व्यसनों में, मैं उलझा रहा।

बेटी ने दवा बने के, सब कुछ छुडृा दिया।।

 दिल को जो चीर दे, बेटो ने सजा ऐसा दिया।

 खुशी बना के सजा को, चेहरा मेरा सजा दिया।।

 बेटियों को मारने का, कइयों को सजा ये मिला।

 बेटे हुए न खुद के, रब ने बांझ तक बना दिया।।

 बेटे की थी ख्वाकहिश, बेटी ने धन्य। बना दिया।

ये घर जो था मकान, उसको महल बना दिया।।

3 Comments

  1. yashoda agrawal 18/10/2012
  2. bhawnapandey 20/10/2012
  3. reena maurya 20/10/2012

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