इन्सानियत पर सवाल….?

इन्सानियत पर सवाल….?

सुना था “नेकी” कर और भूल जा !
किसी “ने” ” की ” और भूल गया;
मासूम सी जान को जंगल में छोड़ गया,
उसमे कोई “ने””की” थी, वह तो भूल गया ।
मासूम जीयेगी ;किस “ने-की” के सवाल से ,
कहते “जीवों” पर दया करे सो मिले प्रभु से;
उस न्हन्नी “जीव”-जान पर दया नहीं कैसे ?
बनते हर तरफ मन्दिर,मस्ज़िद,गिरजाघर-
ईश्वर ,अल्लाह,जीशस को रखने अगर,
यह अनजान,मासूम-नादान क्यों खाये ठोकर ?
हम पाषाण-शीला से भगवान की मूर्ती बनाते,
शायद इसलिये हृदय को पाषाण सा रखते !
कहते कुछ के पास तो हृदय ह़ी नहीं होता,
मस्ज़िद मे खुदा का अबयब कंहा दीखता !
फिर ख़ुदा को याद करते अल्लाह-हो-अकबर,
हृदय हो ना हो,इन्सानियत से क्यों बेखबर ?
यह अधिकार हम कंहा से पाते,कर्म मेरा …..!
फल भुगते कोई मासूम-नादान, बेसहारा-बेचारा,
हम कब इन्सान बनेगें, भगवान भी इन्सान बने,
मानवता से पूजे गये तब जाकर वह भगवान बने।

…..सजन कुमार मुरारका ………

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  1. Yashwant Mathur 20/10/2012

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