जीवन जीना

जीवन जीना

हो गय है जीने सा (सीढियां)

चढना एक एक पौङी

हताश/निराश

हांफते/कांपते

फुलती सांसे

सूखते औंठ

माथे पर पसीना

कितना दूभर

हो गया है जीना

परन्तु ! जो नही आम आदमी

नही चढते सीढियां

फिर भी पहूंच जाते

ऊपर जितना चाहें

आटों लिफ्ट से पल भर में

कितना आसान है चढना

डर भी नही फिसलने का

परन्तु ! फिर भी

फिसल जाते है कभी कभी

जहां नही फिसलता

आम आदमी भी उनकी तरह

जो फिसलते है जिव्हा से/ मंच से

व्याकुल त्रस्त जनता के

आक्रोश के पंच से

अंतरंग  वैडरुम से

आलीशान बथरुम से

जिसके उबरने मे

लग जाती है सदियां

लंगङाते/ घिसटते

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