मानचित्र पर सबकुछ अच्छे

रोते और विलखते बच्चे

 उनके सारे दाबे 

कच्चे !

  नहीं पेट में हैं जब दाने 

 बच्चे घर से चले कमाने 

मजबूरी में पाते

गच्चे !
रोते और विलखते 

बच्चे !!
कचडों में साधन तलाशते 

विद्यालय के बन्द  रास्ते 
बैठक पर बैठक औ
चर्चे !

उनके सारे दाबे

 कच्चे !!

भूख इन्हें मुह रोज

 चिढाती ,

रोटी  पग-पग पर

 ललचाती .

 खिचडी पर खर्चे ही 

खर्चे ! 

रोते और विलखते 
बच्चे !!

जाडे में पाले से मरते 
गर्मी में आतप से जलते 
मानचित्र  पर सब कुछ अच्छे !

कब आया कब बीत गया पन 
बस जर्जर का जर्जर ही तन 

उडी जिन्दगी 
पर्चे – पर्चे !

रोते और विलखते 
बच्चे !!

 रचयिता आचार्य विजय गुंजन

 

 

 
 

 

 

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  1. Rahul prakash 07/06/2015

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