हम गुलशन को ‘शादाब’ समझते रहे….

फरेब को हसीं ख्व़ाब समझते रहे ,
हम काँटों को गुलाब समझते रहे ,

हम दिल के पन्ने दिखाते रहे ,
वो चेहरे को किताब समझते रहे ,

वो देने आया था ग़म का दरिया ,
हम इश्क़ का सैलाब समझते रहे ,

अपने हिस्से क्या आया बटवारे में ,
हम आज तक हिसाब समझते रहे ,

अब उसे जन्नत की ख्वाहिश है ,
जो इश्क़ को अज़ाब समझते रहे ,

उसने सवाल को कभी समझा नहीं ,
हम खामोशी को ज़वाब समझते रहे ,

उदासी बिखरी पड़ी थी फ़िज़ा में ,
हम गुलशन को ‘शादाब’ समझते रहे !!

2 Comments

  1. Manjeet 11/10/2012

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