झुकना सभी के आगे मेरी शान नहीं है….

मरने का भी मुझको कोई अरमान नहीं है ,
पर जीना भी तेरे बगैर आसान नहीं है ,

मैं रूह तो छोड़ आया हूँ तेरी गली में ,
है जिस्म तो मेरे पास मगर जान नहीं है ,

है शिकवा उसको मेरे न रोने का बहुत ही ,
मगर ज़ब्त का उसको मेरे गुमान नहीं है ,

पढ़कर मेरी ग़ज़ल को है उसने ये कहा ,
क्या बात है आज कल तू परेशान नहीं है ,

कुछ हो तो मैं दूँ तुझे तोहफा -ए- वफा ,
खाली है मेरा घर कोई सामान नहीं है ,

भेजा है उसने चारागर को मेरे ही वास्ते ,
लगता है मेरे दर्द से वो अनजान नहीं है ,

सज़्दा करूंगा बस उसी रब्बुल करीम को ,
झुकना सभी के आगे मेरी शान नहीं है !!

2 Comments

  1. नादिर अहमद नादिर 08/10/2012

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