परख…..

नजरो से तुल ही जाती हे,

हेसियत हर शक्स की |

हो ही जाती हे जहा परख,

वक्त आने पर दक्ष की ||

पट ही जाते हे फासले,

‘भुवन’ दूरी मीलो मे रही हो |

पलते वही हे होसले,

गहन गुहाओ मे वक्ष की ||

कोई गम ना उन्हे,

ना रंज ही कभी ।

यूं होता अपनों का ,

अपनों पे कहर ॥

चहुं ओर डरी सी,

खामोशी फैली ।

भुवन की गली हो,

गांव हो, चाहे हो शहर ॥

मिलता नहीं सुकून कभी,

लगाई अपनों की आंच से ॥

‘भारती ‘ क्या नजर में दू ,

गेरों के गुनाहों को ।

भुवन पिघलता जब यहीं,

विश्वास झूठों की सांच से ॥

 

‘ वैद्य भूपेन्द्र शर्मा ‘ (भुवन भारती)

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